इस महिला प्रिंसिपल ने ऐसी बदली सरकारी स्कूल की सूरत प्राइवेट स्कूल छोड़कर यहां पढ़ने आने लगे बच्चे, बेहद खास है इनकी कहानी

आज के इस ज़माने में अगर कोई भी इंसान थोड़ा भी पैसा कमा रहा है तो वह सरकारी प्राइमरी स्कूल को अछूत समझकर अपने बच्चे को बड़े बड़े निजी स्कूल में ही भेजता है, लेकिन आज एक ऐसी मिशाल इस समाज में एक महिला ने दी है जिससे लोग काफी गर्व महसूस कर रहे है. यह मामला है उत्तर प्रदेश के मेरठ के रजपुरा इलाके के सरकारी प्राइमरी विद्यालय की टीचर पुष्पा यादव से जुड़ा हुआ है जिन्होंने अपनी मेहनत से लोगों की इस धारणा को बदल दिया है.

पहने को तो यह स्कूल ‘सरकारी है’, लेकिन इस स्कूल ने इलाके के बड़े बड़े प्राइवेट स्कूलों को मात दे दी है। बच्चे जमीन पर नहीं बैठते। फर्नीचर है। टाइल्स लगे हैं। दीवारों पर पेंटिंग है। दिव्यांग बच्चों के लिए विशेष व्यवस्था है। समर कैंप होता है। यहां तक कि बच्चों के लिए लाइब्रेरी है.

हेल्थ कैंप होता है। रोजगार परक ट्रेनिंग भी दी जाती है। ये उत्तर प्रदेश का संभवतः पहला ऐसा स्कूल है, जहां एलईडी के जरिए स्मार्ट क्लासेस होती हैं। असर ये है कि इलाके के लोग अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूल से निकाल इस स्कूल में भेज रहे हैं.

मेरठ के इस प्राइमरी विद्यालय, रजपुरा का हाल पहले पुरे देश में बदहाली के हाल से गुजर रहे दूसरी जगहों के स्कूलो की तरह ही था, लेकिन अब तस्वीर बदल गई है। इसकी वजह बनी हैं यहां की हेड टीचर पुष्पा यादव। वह बताती हैं कि 2013 में जब विद्यालय में हेड टीचर बनकर आईं तब हाल बुरा था। स्कूल के अंदर जानवर बंधे रहते थे.

पुष्पा बताती हैं कि उन्होंने जेब से रुपए खर्च कर बड़ा गेट लगवाया। स्कूल की दीवारों पर पेंटिंग अपनी भाभी के साथ मिलकर खुद की। साफ़-सफाई कराई. स्थानीय जनप्रतिनिधियों व सामाजिक संगठनों से इस बाबत संपर्क किया। किसी ने फर्नीचर उपलब्ध कराया तो किसी ने स्मार्ट क्लास के लिए एलईडी सहित दूसरा सामान. इस तरह छोटे छोटे चीज़े से यह स्कूल धीरे धीरे साधनो से परिपूर्ण होने लगा..

इस स्कूल के लाइब्रेरी में बच्चों को पढ़ने के लिए अलग टाइम दिया जाता है। लाइब्रेरी की किताबें उन्होंने खुद जुटाई हैं। खेल के लिए सामान, बच्चों को रोजगार परक शिक्षा/प्रशिक्षण, लड़कियों को सिलाई-कढ़ाई, आत्मरक्षा के लिए प्रशिक्षण दिया जाता है.

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